चिकित्सा औषधियो से नही आहार से ही सम्भव है – आहार ओषधम

चिकित्सा औषधियो से नही आहार से सम्भव है

 “आहार औषधम् ‘’

अर्थात् आहार ही औषधि है |

आहार स्वास्थ्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है | रोगों से बचते हुए अपने स्वास्थ्य को बनाये रखने में आहार का संतुलित रखने के सम्बन्ध में जानकारी होना बहुत आवश्यक है |वर्तमान समय में युवाओ में जंक फ़ूड मांसाहारी आदि को खाने से शरीर को सुडोल बनाने की गलत भ्रान्तिया छाई हुई है | जबकि हम यह क्यों भूल जाते है कि इतना विशालकाय हाथी जब अपना पोषण केवल घास पत्तिया खाकर करता है तो  क्या मनुष्य फल सब्जियों,मेवो आदि के सेवन से पोषण प्राप्त करके स्वस्थ दीर्घायु प्राप्त नही कर सकता | हमारे देश की जलवायु को देखते हुए हमे प्रकृति द्वारा आशीर्वाद स्वरूप पंच महाभूत प्रदान किये गये है जिनके सेवन से हम स्वस्थ रहते हुए आसानी से दीर्घायु को प्राप्त कर सकते है |

वर्तमान समय में युवाओ के द्वारा आहार केवल स्वाद पूर्ति का माध्यम सा बन गया है  जबकि आहार से मनुष्य का उद्देश्य मात्र पेट भरना ,स्वास्थ्य प्राप्ति या स्वाद की पूर्ति ही नही है बल्कि मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य को बनाते हुए चरित्र निर्माण करना भी होता है |जिस प्रकार लाल रक्त कोशिकाए हर सेकंड नष्ट होती रहती है वैसे ही लगभग 6 माह में हमारी कोशिकाए व उत्तक भी बदलते रहते है पुन:बनने वाली कोशिकाओ व ऊत्तको की गुणवत्ता उस अंतराल में लिए गये भोजन पर निर्भर करती है |

जैसा  हम सभी जानते है की किसी व्यक्ति को कोई रोग हो जाता है उसका कारण दोष धातुओ की विषम अवस्था ही होती है जिसका सम्बन्ध कही न कही हमारे द्वारा लिए गये भोजन से ही होता है| यदि हम कारण अर्थात रोग के आधार की ही चिकित्सा करे तो सम्भवतः रोग मुक्ति आसानी से हो सकती है | क्योंकि हम औषधि का सेवन कितनी मात्र में कर सकते है यदि हम अनुमान भी लगाये तो अधिक से अधिक 10-10 ग्राम के आधार से दिन में २० ग्राम औषधि का सेवन दिनभर में कर सकते है जबकि आहार की मात्रा दिनभर में 800 ग्राम से 1 किग्रा तक सेवन करते है ऐसे में हम आसानी से अनुमान लगा सकते है की औषधि आहार की तुलना में इतनी कम मात्रा में ले रहे है तो दवाईओ से ज्यादा कही न कही रोग मुक्ति में भोजन का अधिक महत्व रहता है | किन्तु भारतवर्ष में केवल दवाओ पर ही रोगमुक्ति की निर्भरता की भूलवश रोगों के वेग को और अधिक कर लिया जाता है |

आयुर्वेद व प्राकृतिक चिकित्सा में औसध के साथ पथ्य~अपथ्य का विशेष ध्यान रखा जाता है जो उचित भी है क्योंकि रोगमुक्ति आहार से ही संभव है केवल दवाईयों की निर्भरता पर रोग से छुटकारा पाने की लालसा रखना स्वम् के साथ छलावा करने के सामान ही है  |वर्तमान समय में  लाइफस्टाइल सम्बंधित जितने भी रोग पनपते है उन सबकी चिकित्सा आप आहार-विहार परिवर्तन  से बहुत कम समय में आसानी से कर सकते है | यदि रोगी को रोग का आक्रांत अधिक है तो ऐसी स्थिती में रोगी को आयुर्वेद औषधि का सेवन अत्यंत आवश्यक है |

वर्तमान समय के युवाओ की घर से बहार के खाने की तो लत है वो उनको अस्वस्थ करने के लिए काफी है क्योंकि बहार के खाने में काम में लिए जाने वाले तेल को कभी बदला नही जाता है जो हमारे पाचन संस्थान को अस्वस्थ करने के लिए काफी है और यदि हमारा पाचन संस्थान गड़बड़ हो गया तो रोगों की उत्पत्ति तो निश्चित ही होनी है |

वर्तमान समय केभयंकर रूप से बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए और तनावपूर्ण जीवनशैली आदि के बीच अपने स्वास्थ्य को बनाये रखने का एकमात्र  समाधान यही है की जितना हो सके उतना अपने आहार को संतुलित करने का प्रयास करना ही समझदारी है |

आहार व्यवस्था :-

  • प्रात शोच आदि से निवृत होकर ज्यादा समय लिए बिना कुछ फल दूध आदि का सेवन कर लेना चाहिए |
  • नियमित योगाभ्यास प्राणायाम का अभ्यास करे |
  • कब्ज रहने की स्थिति में एनिमा के द्वारा पेट की सफाई करनी चाहिए |
  • अधिक से अधिक मोषमी फल सब्जियों का सेवन करना चाहिए |
  • सुबह के नास्ते में अधिक से अधिक पोस्टिक पदार्थोँ का सेवन करना चाहिए |
  • दोपहर के भोजन में सलाद को अवश्य शामिल करे | छाछ अवश्य ले |
  • श्याम के नास्ते में सूखे मेवे आदि का उपयोग करे |
  • रात के खाने में ओट्स या उबली हुई सब्जियों का ही सेवन करे तो बेहतर रहेगा |
  • बेसन मेदा से बने भोज्य पदार्थो का सेवन कम से कम करे संभव हो तो त्याग ही करे |
  • नींद अच्छी आये इस लिए सोने का समय निर्धारित होना अत्यंत आवश्यक है |
  • अपक्वाहार का सेवन अधिक से अधिक करे |

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