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क्षारसूत्र कर्म

क्षारसूत्र कर्म क्या है एवं कैसे किया जाता है? – आयुर्वेद अनुसार जानिए

क्षारसूत्र कर्म एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है जो मुख्य रूप से रासायनिक क्षार और जल के संयोजन से रोगों का उपचार करती है। यह विशेष रूप से बवासीर (पाइल्स) के इलाज में प्रसिद्ध है, लेकिन इसका उपयोग अन्य कई रोगों के इलाज में भी किया जाता है। क्षारसूत्र कर्म की एक महत्वपूर्ण खासियत यह है कि यह निरस्त रोगी भाग (नस, अंग) को नष्ट कर उस स्थान पर पर्याप्त पोषण देने में सक्षम होता है, जिससे रोगी शीघ्र ही स्वस्थ हो जाता है। इस पद्धति का उपयोग संस्कृत वेदों के समय से ही किया जा रहा है और आज भी यह आयुर्वेदिक चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्षारसूत्र कर्म कैसे किया जाता है?

क्षारसूत्र कर्म को करने के लिए सरल सामग्री आवश्यक होती है, जिसमें मुख्य रूप से दो चीजें शामिल होती हैं: क्षार (Alkali) और सूत्र (Thread)। यह कर्म दो तरह से किया जा सकता है:

क्षारसूत्र कर्म

1. क्षारसूत्र कर्म: इसमें एक ट्यूब या पाइप जिसे क्षारसूत्र कहते हैं, मुख्य रूप से बावसीर के रसायनी द्रव्यों से नहलाया जाता है। इससे बावसीर के नस में आगमन की संभावना कम हो जाती है और रोगी शीघ्र ही ठीक हो जाता है।

2. क्षारसूत्र बन्धन: इसमें क्षारसूत्र का उपयोग रसायनिक द्रव्यों से संयोजित धागे को बावसीर की प्रमुख नस में बांध दिया जाता है। यह बांधन कुछ समय तक रहता है और बावसीर के रक्त संचय को नष्ट कर रोगी को आराम मिलता है। बांधन को समय-समय पर बदला जाता है ताकि इसका अधिक से अधिक लाभ मिल सके।

क्षारसूत्र कर्म का इतिहास:

क्षारसूत्र कर्म का उद्भव वेदों के समय से होता है, जब यह पद्धति मुख्य रूप से बवासीर के इलाज में प्रचलित थी। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी क्षारसूत्र कर्म के उपचार में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। एक विख्यात आयुर्वेदिक ग्रंथ “सुश्रुत संहिता” में इसका विस्तारपूर्वक वर्णन है। इस चिकित्सा पद्धति का उपयोग विभिन्न रोगों के इलाज में किया जाता है, लेकिन अधिकतर इसका प्रयोग बवासीर के उपचार में किया जाता है।

किन रोगों में क्षारसूत्र कर्म बेनिफिशियल है?

क्षारसूत्र कर्म विभिन्न रोगों के उपचार में बेहद फायदेमंद है। इसका उपयोग निम्नलिखित रोगों के इलाज में किया जा सकता है:

1. बवासीर (पाइल्स): यह पद्धति बवासीर के इलाज में बहुत सारे लाभ प्रदान करती है। यह बावसीर के रक्त संचय को नष्ट कर रोगी को आराम मिलता है।

2. भगन्दर (फिस्टुला): क्षारसूत्र कर्म से भगन्दर के मुख में रसायनी द्रव्यों को डालने से भगन्दर में सुधार होता है।

3. अर्श (खराबी): बवासीर के साथ-साथ अर्श के उपचार में भी क्षारसूत्र कर्म प्रयोगी है।

4. उल्कापित्त (पेप्टिक अल्सर): उल्कापित्त के उपचार में क्षारसूत्र कर्म के उपयोग से आराम मिलता है।

5. भ्रूणह्यदंत्र (फिस्टुला इन एनो): क्षारसूत्र कर्म से भ्रूणह्यदंत्र के उपचार में सुधार होता है।

कौनसी औषधियां उपयोग में ली जाती हैं?

क्षारसूत्र कर्म के दौरान विभिन्न रसायनी द्रव्यों का उपयोग किया जाता है, जिनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित द्रव्य होते हैं:

1. सोडियम बाइकार्बोनेट (सोडा): सोडियम बाइकार्बोनेट बहुत सी रोगों के इलाज में उपयोगी होता है, विशेष रूप से बवासीर में।

2. सोडियम पोटैशियम टार्ट्रेट (सार्बोनेट): यह एक औषधि और खाद्य समग्री है जो बावसीर के उपचार में उपयोगी होती है।

3. अपामार्ग क्षार (अच्य्रंथेस अस्परा): इस द्रव्य का उपयोग जल और क्षार के संयोजन में किया जाता है।

4. खारलोह (पोटासियम कार्बोनेट): यह बावसीर के इलाज में उपयोगी होता है और रक्त संचय को कम करने में मदद करता है।

क्षारसूत्र कर्म करने का प्रोसेस:

1. रोगी का चिकित्सक द्वारा परीक्षण: आयुर्वेदिक चिकित्सक रोगी का सम्पूर्ण परीक्षण करेंगे और उनके लक्षणों और रोग की गुंजाइश करेंगे।

2. क्षारसूत्र उपचार का निर्धारण: रोगी के लक्षणों के आधार पर चिकित्सक उचित क्षारसूत्र उपचार का निर्धारण करेंगे।

3. संयोजन और निर्धारण: उचित क्षार और जल के संयोजन के बाद चिकित्सक क्षारसूत्र बनाएंगे।

4. क्षारसूत्र बन्धन: चिकित्सक द्वारा तैयार किए गए क्षारसूत्र को रोगी के प्रधान रोग स्थल पर बांध दिया जाएगा।

5. प्रोसेस का निरीक्षण: क्षारसूत्र बन्धन के बाद, चिकित्सक रोगी का प्रोसेस का निरीक्षण करेंगे और उन्हें आवश्यकता अनुसार बदलाव करेंगे।

6. सावधानी और देखभाल: क्षारसूत्र कर्म के दौरान सावधानीपूर्वक और स्वच्छता का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है। रोगी को उचित आहार और व्यायाम का सुझाव दिया जाता है।

कुछ जरूरी बातें:

1. इस पद्धति का उपयोग किसी अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सक द्वारा ही करना चाहिए।

2. आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह के बिना किसी भी दवा या उपचार का सेवन न करें।

3. चिकित्सा प्रक्रिया के बाद भी अपने चिकित्सक के सम्मति से ही दवाएं लें और आवश्यक बदलाव करें।

4. क्षारसूत्र कर्म के दौरान सावधानीपूर्वक हैंडल करें और स्वच्छता का ध्यान रखें।

5. उचित आहार और व्यायाम का पालन करें और स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं।

संक्षेप में कहें तो, क्षारसूत्र कर्म एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है जो मुख्य रूप से बवासीर के उपचार में प्रयोग की जाती है। इसमें रासायनिक क्षार और जल के संयोजन से रोगों का उपचार किया जाता है। इस पद्धति को करने के लिए सुनिश्चित रूप से विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह लेना चाहिए और प्रोसेस के दौरान सावधानी और स्वच्छता का ध्यान रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके उपयोग से बावसीर जैसी रोगों के इलाज में आराम मिल सकता है और रोगी शीघ्र ही स्वस्थ हो जाता है। इसलिए, अगर आपको इन तरह के किसी रोग से पीड़ित होने पर तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें और उचित इलाज का लाभ लें।

Dr Ramhari Meena

Founder & CEO - Shri Dayal Natural Spine Care. Chairmen - Divya Dayal Foundation (Trust) Founder & CEO - DrFindu Wellness

Written by

Dr Ramhari Meena

Founder & CEO - Shri Dayal Natural Spine Care. Chairmen - Divya Dayal Foundation (Trust) Founder & CEO - DrFindu Wellness

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