जाने प्राकृतिक चिकित्सा की परिभाषा, इतिहास , मूलभूत सिद्धांत और फायदे

प्राकृतिक चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा की परिभाषा

एक ऐसी प्राचीन चिकित्सा पद्धति जो बिना दवाओ के सहारे के केवल मात्र योग आराम , स्वछता , उपवास, आहार-विहार , जल , मिट्टी, वायु, प्रकाश आदि के संतुलित उपयोग मात्र से ही स्वस्थ और दीर्घायु की और हमारे स्वास्थ्य को ले जाती हेयही प्राकृतिक चिकिय्सा है |  पंचमहाभूतात्म्क  शरीर में प्रकृति प्रदत्त  पंचमहाभूतो की  सामंजस्यता को बनाये रखना ही प्राकृतिक चिकित्सा है |जिस चिकित्सा पद्धति में पंचमहाभूतो यथा :-

क्षिति जल पावक गगन समीरा |

पञ्च तत्व से बना शरीरा ||

अर्थात पृथ्वी ,जल,वायु,अग्नि,आकाश आदि के उचित प्रयोग मात्र  से शरीर में उत्पन्न हुए रोगों का निराकरण कर दिया जाता है वह प्राकृतिक चिकित्सा है |

प्राकृतिक चिकित्सा

बीमारियाँ दूर करने के इन साधनों का उपायोग किसी न किसी रूप में सभी चिकित्सा पद्धतियों में आसानी से मिल जाता हे जिसका प्रमाण मोहन-जोदड़ो, मेसोपोटामिया तथा बेबीलोनया आदि में मिलता है |

प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास

प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति भारत की अपनी प्राचीन चिकित्सा पद्धति है |किन्तु बीच में इसका संसार से विलुप्त हो जाने के बाद इसके वापस पुनर्निर्माण का श्रेय पाश्चात्य देशो को ही है इस बात से हम बिल्कुल भी नही मुकुर सकते है |

प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान या प्राकृतिक चिकित्सा का उद्भव प्रकृति के साथ ही माना गया हे | जिसका मूल कारण यह भी माना जाता है  की प्रकृति से ही इस चिकित्स्या प्रणाली का जन्म हुआ हे | क्योकि जिन पंचमहाभूतो से प्रकृति बनी हुई है उन्ही से प्राकृतिक चिकित्सा |इसी कारण यह चिकित्सा प्रणाली दुनिया की सबसे पुरानी  चिकित्सा प्रणाली मानी जाती है और हमे यह कहने में बिल्कुल भी अतिश्योक्ति नही होगी की यह प्रणाली सभी चिकित्सा प्रणालियों की जननी है |

वेद जैसे प्राचीन ग्रंथो मै भीं इसके  कई स्वास्थ्यवर्धक तरीको के बारे में जैसे उपवास, जल, मिटटी आदि का वर्णन आसानी से मिल जाता है | वेद काल के बाद पुराण काल में भी इस पद्धति का काफी प्रचलन था जिसमे जिसमे राजा दिलीप दुग्ध-कल्प और जंगल –सेवन और रजा दसरथ की रानियाँ ने एक ही फल के सेवन से संतानोत्पति में सहायता ली गयी | पुराण काल के समय की एक घटना का जिक्र ”महाबग्ग” नामक बोद्ध ग्रन्थ  में  इस प्रकार है जिसमे बताया हे की एक बार भगवन बुद्ध श्रावस्ती नगरी से राजग्रह जाते समय कलंद नामक निवाय संघ में रुके हुए थे वहाँ किसी व्यक्ति को सांप ने डस लिया इस बारे में भगवन बुद्ध को मालूम हुआ तो उन्होंने कहा की है भिक्षुओ में तुम्हे निर्देश देता हु की सर्पविष के नाश हेतु चिकनी मिटटी ,गोबर, मूत्र और राख का उपयोग करो | अत लगभग 2500 वर्ष पुराणी उस घटना से इस बात का प्रमाण मिलता हे की रोग नाश के लिए मिटटी का प्रयोग अति प्राचीन काल से ही किया जाता हे |

आदिकाल में आज की भांति न तो भांति भांति प्रकार की ओषधिया थी और न ही डॉक्टर और अस्पताल फिर भी लोग आज की भांति लम्बी आयु तक स्वस्थ रहते थे क्योकि उस समय लोग प्राकृतिक रूप से स्वस्थ रहते थे |

जैसे जैसे ओषधियों का तथा चिकित्सको का जोर बढ़ता गया वैसे वैसे प्राकृतिक चिकित्सा विलुप्त होती चली गयी |

लगभग 18 वी शताब्दी के मध्य प्राकृतिक चिकित्सा का फिर से पुनरुत्थान होने लगा और इसके बाद से ही हम इसकी उपयोगिता के बारे में हमारा ज्ञान व् रूचि बढने लगी | प्राकृतिक चिकित्सा के पुनरुत्थान में उनका प्रमुख स्थान रहा हे जिनके स्वम् के प्राण भी इसी प्रणाली से बचे थे |

प्राकृतिक चिकित्सा के पुनरुत्थान के सहयोगी

प्राकृतिक चिकित्सा के पुनरुत्थान के कुछ सहभागियो की संक्षिप्त जानकारी –

डॉ.सरजान फ्लायर :- इंग्लैंड निवासी जिन्होंने जल के स्वास्थवर्धक प्रभाव के बारे में लोगो को बताया |

डॉ.जेम्सक्युरी :-लिवरपूल निवासी जिन्होंने 1717 ई . के लगभग “जल चिकित्सा संबंधि पुस्तक को लिखकर इसका प्रकासन करवाया |

विनसेंज प्रिस्निज : कुछ विद्वानों कि धारणा के अनुसार डॉ प्रिस्निज ही आधुनिक प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली के जनक हे |

जोहान्स स्कोथ :-एक साधू द्वारा प्रेरित होकर प्राकृतिक चिकित्सा में सिद्धहस्त हुए |इनकी चिकित्सा प्रणाली को स्क्रोथ चिकित्सा के नाम से पुकारते हे |प्राकृतिक चिकित्सा के उत्थान के लिए इनको  जेल भी जाना पड़ा जिसमे दुश्मनो को मुह की खानी पड़ी और ये अपनी क्रांति में सफल हुए |

लुइकुने:- इन्हे विशेषकर जल को पुनः जीवित करने का श्रेय जाता हे कुने इस विधा के सबसे बड़े आचार्य  माने जाते हे |यहा तक की इस पद्धति का दूसरा नाम कुने चिकित्सा प्रणाली पड़  गया हे |

महात्मा गाँधी : हमारे राष्ट्रपिता गाँधी जी ने अनुभव किया की लोक कल्याण हेतु यदि कोई व्यवहारिक सर्वोत्तम और सच्ची चिकित्सा पद्धति प्राकृतिक चिकित्सा के अलावा हो ही नही सकती हे गाँधी जी एक कुशल प्राकृतिक चिकित्सक थे | स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का शेष जिवन प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचार प्रसार में लगा देना चाहते थे |

प्राकृतिक चिकित्सा के मूलभूत सिद्धांत

सभी रोग एक, उनके कारण और चिकित्सा भी एक

जिस प्रकार समूचे ब्रह्मांड में ईश्वर एक ही है किन्तु भिन्न भिन्न नामो से पुकारा जाता है उसी प्रकार हमारे शरीर में उत्पन्न हुए रोगों का कारण भी एक ही होता है और उनको अलग अलग नामो से पुकारा  किया जाता है |  उसी प्रकार हमारे शरीर के रोग भी एक ही हे जबकि पुकारते अलग अलग नामो से है |

जैसे एक परिवार के सभी सदस्यों का भोजन एक जैसा होते हुए भी उनमे से  कई सदस्य तो स्वस्थ रहते  है और कई अस्वस्थ  इस प्रकार की भिन्नता का कारण उनके आहार विहार के तोर तरीको पर निर्भर करता है | परिवार का जो सदस्य नियमित दिनचर्या का पालन करता हे वो स्वस्थ रहता हे जो नही करता  वही व्याधि ग्रस्त हो जाता है  |

प्राकृतिक चिकित्सा में अक्सर देखा भी जाता है की रोगी एक रोग की चिकित्सा हेतु आता हे और उसी रोग की चिकित्सा के साथ ही अनेको छोटे छोटे रोग स्वत: ही समाप्त हो जाते है |इससे यह स्पस्ट होता है की सभी रोग एक ही होते है और वे सब रोग एक ही प्रकार की चिकित्सा से नस्ट भी हो जाते है क्योकि उन सब रोगों के उत्पन्न होने का कारण केवल एक  ही होता है –शरीर में मल का इकट्ठा हो जाना |

रोग उत्पत्ति के कारण कीटाणु नही है

उपर्युक्त  लेख से यह  तो पूर्णत: स्पस्ट हो गया है की हमारे शरीर में इकट्ठे हुए दूषित मल ही रोगोत्पत्ति में सहायक होते हे इन सब बातो को जान लेने के बाद यह शंका तो रहती ही नही हे की रोगाणु/कीटाणु रोगों के कारण बनते हे फिर भी एलोपथिक चिकित्सको की धरना ही नही वरन उनका सिद्धांत भी है |

कीटाणु हमारे शरीर में प्रविष्ट होकर हानि नही पहुचाते हे अपितु ये हमारे शरीर में अनगिनत स्वस्थ कोषों में बदल जाते है जिनसे शरीर का निर्माण होता है |इसके विपरीत जब हमारा खान-पान ठीक नही रहता है तब यही हमारे शरीर को हानि पहुचाने लगते है |अत:यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है की कीटाणुओं का दुष्प्रभाव उन्ही शरीरो में संभव हे जिनमे पहले से ही रोग के कारण विजातीय द्रव उपस्थित हो अथवा जो रोग ग्रस्थ हो |

जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है उनके शरीर में ये कीटाणु रोग उत्पन्न कर सकते है  |अत ये हम ये ख सकते हे की कीटाणु रोग उत्पन्न नही करते वरन रोग ही कीटाणु उत्पन्न करते हे |

रोग शत्रु नही ,मित्र होते है

जैसा की हम जानते हे हर क्षण  हमारे शरीर में विजातीय द्रव उत्पन्न होते रहते है ,जिनको हम विभिन्न मार्गो के द्वारा  शरीर से बहार निकालते रहते है जैसे मल मार्ग रोमकूप गुर्दे गुदा आदि प्रतिदिन निकलते है |जब यही मल किसी कारणवश बहार नही निकल पाते है तो रोग उत्पन्न करके शरीर से बहार निकलने का प्रयास करते है इसी स्तिथि को रोग होना कहा  जाता है अथवा ये कहा जा सकता है की रोग हमे स्वास्थ्य देने आते है न की स्वस्थ्य लेने | अत: यह कहा जा सकता है की रोग हमारे शत्रु नही  मित्र होते   है |

प्रकृति स्वयं चिकित्सक है

अक्सर हम देखते है की ऋतू परिवर्तन के समय अधिकतर लोगो को अस्वस्थता का सामना करना पड़ता है जो कोई समस्या नही बल्कि हमारे द्वारा पिछली ऋतू में की गयी गलत आदतों के दुस्प्र्भावो को प्रक्रति स्वत ही निस्तारण करती है | प्रकृति स्वम् चिकित्सक है इसको ऐसे जाने की जब हमारी नाक में कुछ चला जाता हे तो उसको कोण बहार निकलता है कुछ जहरीली वस्तु हमारे पेट में जाने के बाद उल्टी की प्रिक्रिया प्रकृति की ही तो देन है | इसी तरह अस्थमा ,गठिया जैसे रोग शरीर शुद्धी के लिए पृकृति के प्रयास ही तो होते है किन्तु हम आधुनिकता की दोड़ में इस और ध्यान न देकर अंग्रेज़ी दवाओ का सहारा लेकर और अधिक रोग ग्रस्त हो जाते है अत यह हमेशा याद रखना चाहिए की रोगी को रोग से मुक्ति अपने आप से ही मिलती है रोगों का निवारण उसका शरीर स्वम ही करता है प्राकृतिक चिकित्सक का कार्य सिर्फ इतना ही है की वः इस कार्य में उसकी मदद करे |प्रकृति हर सम्भव हमारे मदद करती है किन्तु जब हम ही उसका साथ नही दे तो वह भी आपका साथ छोड़ देती है |

चिकित्सा रोग की नही रोगी के पुरे शरीर की होती है

प्राकृतिक चिकित्सा विश्व की एक मात्र चिकित्सा पद्धति है जिसमे रोग की नही अपितु रोगी के पुरे शरीर की चिकित्सा की जाती है बाकि सभी चिकित्सा पद्धतियों में सिर्फ रोग की चिकित्सा पर ही ध्यान दिया जाता है | जैसे सिर दर्द होने पर सिर दर्द की दवा नही बल्कि सिर दर्द के कारण श्वरूप पाचन प्रणाली के उत्पन्न दोषों या पुरे शरीर के रक्त  दोष की होनी चाहिए जिसके करने से सिर दर्द स्वत ही ठीक हो जायेगा |

प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा प्रत्येक रोग ठीक किया जा सकता है किन्तु प्रतेक रोगी नही क्योकि रोगी का अच्छा होना इन पांच  बातो पर निर्भर करता है

–रोगी के शरीर में विजातीय द्रव्यों की मात्र कितनी है ?

-रोग निवारण हेतु यथेस्ट जीवन शक्ति उसमे है या नही ?

-रोगी किस हद तक चिकित्सा करवा चूका है या क्र रहा है वः धैर्य खो तो नही रहा है ?

-प्राकृतिक चिकित्सा से पहले रोगी को कोई घातक ओषधियों का सेवन तो नही करवाया गया है या ऑपरेशन तो नही हुआ हुआ है ?

-रोगी प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली में विस्वास करता है या नही ?

प्राकृतिक चिकित्सा में रोग निदान

प्राकृतिक चिकित्सा में जैसा की उपरोक्त कहा जा चुका हे की इस पद्धति में चिकित्सा रोग की नही बल्कि रोगी की की जाती है |प्रकृति यह कभी नही चाहती की कोई बेवजह रोगों के निदान के लिए माथापच्ची करे |पृकृति और परमात्मा के गूढ़ रहस्यों का पता लगाने का दावा करने वाले मानवकृत उपकरणों से रोग का पता लगाने से  लगभग 90 %निदान सरासर गलत होते है और बचे हुए 10% जो सही होते है वो भी इत्तेफाक ही है |निदान के लिए एक प्राकृतिक चिकित्सक को केवल इतना ही देखना होता है की विजातीय द्रव शरीर के किस भाग में स्थित है |यदि वह सामान्य हुआ तो वह प्राकृतिक उपचार से  शीघ्र ही ठीक हो जायेगा |उपरोक्त विवेचन से स्पस्ट हो जाता है की प्राकृतिक चिकित्सा की निदान विधि भी उतनी ही सरल और सहज है जितनी की उसकी चिकित्सा इसमें भटकने और बहकने का बिलकुल भी भय नही है |

जीर्ण रोगों के आरोग्य में समय लग सकता है

प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक लिन्द्ल्हार की चिकित्सा पर आक्षेप करते हुए उनके किसी विरोधी ने कहा कि प्राकृतिक चिकित्सा से तो रोग बहुत समय के बाद ठीक होते है इसके प्रत्युतर में डॉ. लिन्द्ल्हार ने तुरंत कहा ऐसा बिल्कुल नही ,प्राकृतिक चिकित्सा से तो रोगी बहूत जल्दी ठीक होते है इतना ही नही बल्कि संसार में प्रचलित सभी चिकित्सा पद्धतियों में सबसे तेज रफ्तार वाली चिकित्सा प्राकृतिक चिकित्सा ही है मगर एक प्राकृतिक चिकित्सक की ये विडंबना है की रोगी जब सब जगह से हतास हो जाता है तब जाके प्राकृतिक चिकित्सक के पास जाता है |

प्राकृतिक चिकित्सा से दबें हुए रोग बहार निकलते है

जहा ओषधि सेवन से उभरे रोग दब जाते है ,वहा प्राकृतिक उपचार से दबे रोग उभरते है | उभार से मतलब होता है की चिकित्सा के दोरान रोग के लक्षणों में वृद्धि का होना साथ ही साथ जीर्ण रोग के उपचार के समय जीवनी शक्ति में हो रही वृद्धि के परिणाम श्वरूप ये जड से खत्म हो जाते है |हम इसे इसप्रकार समझ सकते है की जब महिलाओ में मासिक धर्म के समय होने वाली असहनीय पीड़ा के साथ भारीपन तथा मासिकधर्म के खत्म होने के बाद स्फूर्ति व् हल्कापन महसूस करना ये सब प्र्क्रितिप्र्दत्त स्वस्थ होने की एक प्रीक्रिया ही तो हे जो हमे दोषमुक्त करके स्वस्थ रखती हे |हमारे शरीर में एकत्रित हुए मल मूत्र के निस्तारण के बाद भी तो हम आरामदायक महसूस करते है ये सब हमे प्रकृति द्वारा आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त है |इस लिए सही ही कहा है की प्राकृतिक चिकित्सा से दबे हुए रोग निकलते है |

प्राकृतिक चिकित्सा से मन शरीर व् आत्मा तीनो स्वस्थ होते है

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा दी गयी स्वास्थ्य की परिभाषा में भी शरीर मन व आत्मा के स्वस्थ होने को ही सम्पूर्ण स्वास्थ्य माना गया है |प्राकृतिक उपचार में एक प्राकृतिक चिकित्सक इन तीनो पर ही ध्यान रखते है यही इस पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता है |जब तक एक रोगी का शारीरिक स्वास्थ ठीक नही है तब तक उसका मानसिक स्वर=स्वास्थ्य भी ठीक नही हो सकता और जब आपका जब तक मानसिक स्वास्थ्य ठीक नही है तब तक उसका आत्मिक स्वास्थ्य  भी ठीक नही हो सकता |और इन सभी की एक साथ चिकित्स्या मात्र प्राकृतिक चिकित्स्या में ही की जाती है अन्य किसी चिकित्स्या पद्धति में नही |प्राकृतिक चिकित्सा के आयामों  जैसे प्राकृतिक आहार –विहार,आदि को अपनाने से हमारे जीवन में सात्विकता आकर हम स्वस्थ रह सकते है यही हमारे मन को संयमित करके हमे अधात्म की और ले जाते है |

प्राकृतिक चिकित्सा में ओषधियों के दिए जाने का प्रश्न ही नही

प्राकृतिक चिकित्सा का सिद्धांत में कहा गया है की प्रकृति से बढ़ा कोई चिकित्सक नही है फिर ही वर्तमान समय के डॉक्टर अनेको दवाईयों का प्रयोग करके रोगों से मुक्ति दिलाना चाहते है किन्तु उनके हाथ फिर भी असफलता ही लगती है |जिन दवाईयों का हम स्वस्थता की अवस्था में सेवन नही क्र सकते फिर भी न जाने क्यों रोग  की अवस्था में उनका सेवन करवाया जाता है और किस उम्मीद से |जिस द्रव का सेवन स्वस्थ मनुष्य के लिए लाभदायक नही है तो फिर वह रोगी के लिए कैसे लाभदायक हो सकता है |

प्राकृतिक चिकित्सा के फायदे

प्राकृतिक चिकित्सा एकमात्र ऐसी चिकित्सा विज्ञानं है| जिसका उपयोग आप किसी रोग विशेष के लिए करते हो तब भी आपके शरीर में उत्पन्न सभी रोगों का स्वत ही समन हो जाता है|  जिसको यदि आप एक बार किसी चिकित्सक की देखरेख में उपयोग कर लेते हो तो उसके परामर्श मात्र से ही आगे भी आप इसका लाभ ले शकते हो क्योकि ऐसे चिकित्सा प्रणाली जिसका आप रोज सेवन करते हो किन्तु सेवन करने के दोरान ही कुछ विषम अवस्था के कारणों से रोगोत्पत्ति हो जाती है उसे साम्यावस्था करके ठीक किया जा सकता है | इस प्रणाली में विशेष ध्यान योग्य बात आप से ज्यादा आपके शरोर को कोई नही समझ सकता है |आप चिकित्सा एक रोग की लेते हो किन्तु स्वास्थ्य लाभ सम्पूर्ण शारीरिक व् मानसिक होता है |

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